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Arya Samaj Mandir Hindi Me Sanskar

आर्य समाज पंडित जी

आर्य समाज पंडित जी में आपका स्वागत है आर्य समाज पंडित जी द्वारा संपूर्ण 16 संस्कारों को वैदिक मंत्रों के साथ पुरे विधि विधान से कराया जाता है जैसे विवाह संस्कार गर्भाधान संस्कार, पुंसवन संस्कार, सीमान्तोन्नयन संस्कार, जातकर्म संस्कार, नामकरण संस्कार, निष्क्रमण संस्कार, अन्नप्राशन संस्कार, चूडाकर्म संस्कार, कर्णवेध संस्कार, उपनयन संस्कार, वेदारम्भ संस्कार, समावर्तन संस्कार, विवाह संस्कार, वानप्रस्थ संस्कार, सन्यास संस्कार, गृह प्रवेश पूजन, भूमि पूजन, दुकान उद्घाटन, शोकसभा, रसम पगड़ी, अन्त्येष्टि संस्कार, अन्तिम् संस्कार, अन्तिम यात्रा, अन्तिम निवास इत्यादि
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संस्कार क्यों और कैसे

संस्कार का अर्थ यह है कि किसी वस्तु के रूप को बदल देना उसे नया रूप दे देना । वैदिक संस्कृति में मानव जीवन के लिए सोलह संस्कारों का विधान हैं। इसका अर्थ यह है कि जीवन में सोलह बार मानव को बदलने का , उसके नव-निर्माण का प्रयत्न किया जाता है। जैसे सुनार अशुद्ध सोने को अग्नि में डाल कर उसका संस्कार करता है । ठीक उसी प्रकार बालक के जन्म होते ही उसे संस्कारों की भट्टी में डाल कर उसके दुर्गुणों को निकाल कर उसमें सद्गुण डालने के प्रयत्न को वैदिक विचारधारा में संस्कारकहा गया है । चरक ऋषि ने कहा है।
संस्कारो हि गुणान्तराधानमुच्यतेअर्थात् पहले से विद्यमान दुर्गुणों को हटाकर उसकी जगह सद्गुणों का आधान कर देने का नाम संस्कार है ।

1:- गर्भाधान संस्कार

युवा स्त्री-पुरुष उत्तम् सन्तान की प्राप्ति के लिये विवाह के पश्चात् शुक्ल पक्ष में पति पत्नि प्रसन्न होकर हवन करके उत्तम सन्तान के प्राप्ति हेतु प्रसन्नता पूर्वक सहवास से गर्भाधानंम् करें ।।१।।

2:- पुंसवन संस्कार
जब गर्भ की स्थिति का ज्ञान हो जाए, तब दुसरे या तीसरे महिने में गर्भ की रक्षा के लिए स्त्री व पुरुष प्रतिज्ञा लेते है कि हम आज ऐसा कोई कार्य नहीं करेंगे जिससे गर्भ गिरने का भय हो। उस समय माता को उत्तम खान पान व आचार विचार ठीक प्रकार से रखे ।।२।।

3:- सीमन्तोन्नयन संस्कार
यह संस्कार गर्भ के चौथे मास में बच्चे की मानसिक शक्तियों की वृद्धि के लिए किया जाता है इसमें ऐसे साधन प्रस्तुत किये जाते है जिससे स्त्री प्रसन्न रहें। सीमन्तोन्नयन संस्कार करना चाहिए अर्थात् जिसको हम बोल चाल के भाषा में गोद भराई कहते हैं।।

4 :- जातकर्म संस्कार
यह संस्कार बालक के जन्म लेने पर होता है। इसमें पिता या वृद्ध सोने की सलाई द्वारा घी या शहद से जिह्वा पर ओ३म् लिखते हैं और कान में ‘वेदोऽसि’ ( तू ज्ञान प्राप्त कर ) चारों वेद के नाम बोले तथा नाभि को चार अंगुल ऊपर सूति धागे से बाँधकर नाडी छेदन करे।। ४।।।

5 :- नामकरण संस्कार
जन्म से ग्यारहवें या एक सौ एक या दुसरे वर्ष के आरम्भ में बालक का नाम प्रिय व सार्थक रखा जाता है।लड़का हो तो सम अक्षर तथा लड़की हो तो विषम अक्षर से नाम करण करे ।।५।।

6 :- निष्क्रमण संस्कार
यह संस्कार बालक के जन्म के बाद चौथे महिने के शुक्ल पक्ष में हवन कर बालक को घर से बाहर शुद्ध वायु में निकाले तथा भ्रमण कराये और सृष्टि के अवलोकन का प्रथम शिक्षण है।।।६।।

7 :- अन्नप्राशन संस्कार
छठे व आठवें महिने में जब बालक की शक्ति अन्न पचाने की हो जाए तो यह संस्कार होता है। जन्म के छठवे माह में हवन कर उत्तम षौष्टिक युक्त खीर बनाकर बालक को सोने या चाँदी के पात्रों से प्रेम पूर्वक खिलावें ।।७।।

8 :- चूडाकर्म- मुंडन संस्कार
पहले या तीसरे वर्ष में बालक के बाल कटाने के लिये किया जाता है।जन्म के पश्चात् पहले या तीसरे साल मुण्डन संस्कार करना चाहिए। इस संस्कार में योग्य परोहित की देख रेख में हवन कर उत्तम दही, मक्खन तथा उड़द का दाल व कुशा को लेकर बालक का केश छेदन करें

9 :- कर्णवेध संस्कार
कई रोगों को दूर करने के लिए बालक के कान बींधे जाते है। तीसरे वर्ष में शुद्ध जल से स्नान कराकर उत्तम वस्त्र पहनाकर तथा हवन कर दोनों कानों का छेदन करें ।।

10 :- उपनयन संस्कार
जन्म से आठवें वर्ष में इस संस्कार द्वारा लडके व लड़की को यज्ञोपवीत ( जनेऊ) पहनाया जाता है। बालक के जन्म के बाद ब्रह्मण पुत्र का ८वें , क्षत्रिय के पुत्र का १२वें तथा वैश्य के पुत्र का १६वें वर्ष में यज्ञकुण्ड के समीप आहुति पूर्वक यज्ञोपवित करना चहिए तथा गायत्री मंत्र का उच्चारण करा अक्षर ज्ञान करावें ।।

11 :- वेदारम्भ संस्कार
उपनयन संस्कार के दिन या एक वर्ष के अन्दर ही गुरूकुल में वेदों का आरम्भ गायत्री मंत्र से किया जाता है। ये संस्कार गुरूकुल में आचार्य के सानिध्य में करें ।।११।।

12 :- समावर्तन संस्कार
जब ब्रह्मचारी व्रत की समाप्ति कर वेद- शास्त्रों के पढ़ने के पश्चात गुरूकुल से घर आता है तब यह संस्कार होता है। २५वर्ष तक वेदों का सागोंपांग अध्ययन कर शिक्षा पूरी करके आचार्य को उत्तम वस्त्रादि गुरू दक्षिणा देकर करें ।१२।

13 :- विवाह संस्कार
विद्या प्राप्ति के पश्चात् जब लड़का,लड़की भली भांति पूर्ण योग्य बनकर घर जाते है तब विवाह दोनों का गुण,कर्म स्वभाव देखकर किया जाता है। २५ वर्ष के बाद अथवा पूर्ण अखंडित ब्रह्मचारी ४८ वर्ष के बाद उत्तम आचारण वाले युवक और युवतियाँ प्रसन्नता पूर्वक वैदिक विधान से चाहिये। अपने गोत्र के आठ पीढ़ी में विवाह नहीं करना चाहिये। जिस परिवार में मानसिक रोग या टीबी रोग या कर्म रोग हों वहाँ शादी नहीं करनी चाहिए।।१३।।।

14 :- वानप्रस्थ संस्कार

बेटे का बेटा / सन्तान हो जाय , ५० वर्ष पूरा हो जाय तब अपने गृह का भार बेटे को सौप कर पीले कपड़े धारण कर पति पत्नि यज्ञ में आहुति पूर्वक वानप्रस्थ संस्कार करवाए और आश्रमों में रहकर नित्य यज्ञ व वेदों का स्वाध्याय करते रहे ।व समाज की उन्नत्ति में योगदान दे ।।१४।।

15 :- सन्यास संस्कार

वानप्रस्थी वन में रह कर जब सब इन्द्रियों को जीत ले, किसी में मोह व शोक न रहें तब केवल संस्कार हेतू संन्यास आश्रम में प्रवेश किया जाता है। ७५ वर्ष हो जानेपर जिस दिन पूणर्ण वैराग्य होजाने पर केसरी वस्त्र धारण कर समाज की उन्नत्ति में तथा शेष जीवन को ईश्वर उपासनापूर्वक व्यतीत करे।।१५।।

१६ :- अन्त्येष्टि संस्कार
मनुष्य शरीर का यह अन्तिम संस्कार है। मृत्यु के पश्चात् मृत शरीर को उत्तम घी सामग्री से वैदिक मंत्रों से दाह संस्कार करना चाहिए. सामर्थ्यानुसार शरीर के भार का घी और दुगने भार की सामग्री डाल कर दाह संस्कार करें इस का मुख्य उदेश्य है कि जल वायु प्रदूषण मुक्त रहें।

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